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परवेज मुशर्रफ अपने देश के पहले ऐसे पूर्व तानाशाह बन गए
December 21, 2019 • RAGINI SINGH

तानाशाह को मृत्युदंडपरवेज मुशर्रफ अपने देश के पहले ऐसे पूर्व तानाशाह बन गए हैं जिन्हें राजद्रोह के अपराध में मौत की सजा सुना दी गई। विशेष अदालत की तीन जजों वाली बेंच ने दो-एक के बहुमत से मंगलवार को उनके लिए यह सजा मुकर्रर की। हालांकि मुशर्रफ 2016 से ही स्वास्थ्य और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए दुबई में रह रहे हैं। इस बात की संभावना कम है कि वह स्वदेश लौटेंगे और उन्हें सुनाई गई इस सजा पर अमल हो पाएगा। बावजूद इसके, पाकिस्तान के लोकतांत्रिक इतिहास में यह फैसला मील का पत्थर माना जा रहा है। कोर्ट ने मुशर्रफ पर लगाए गए इस आरोप को सही पाया कि 2007 में उन्होंने संविधान को निष्प्रभावी करते हुए देश पर असंवैधानिक रूप से आपातकाल लाद दिया था। हालांकि ऐसा करने वाले मुशर्रफ पाकिस्तान के अकेले सैन्य प्रमुख नहीं हैं।
सैन्य शासन का साया इस पड़ोसी देश पर इस कदर छाया रहा कि लोकतंत्र वहां ढंग से पनप ही नहीं पाया। 72 साल के इतिहास में आधे से ज्यादा समय तक वहां सेना ही शासन में रही। स्वाभाविक रूप से स्थिति ऐसी हो गई कि देश की नौकरशाही में चुनी हुई सरकारों को लेकर वह इज्जत नहीं पैदा हुई, जो एक कामकाजी व्यवस्था के लिए जरूरी है। जब भी कोई निर्वाचित सरकार सत्ता में आई, उसे 'फिल द गैप अरेंजमेंटÓ के रूप में लिया गया और इंतजार किया जाता रहा कि कब सेना उसको बेदखल कर सत्ता अपने हाथ में लेती है। पाकिस्तान के सैनिक तानाशाहों के साथ एक दिक्कत यह भी रही कि आधुनिक जीवन मूल्यों की नुमाइंदगी करने में उनकी वैसी दिलचस्पी नहीं थी, जैसी तुर्की, इजिप्ट और इराक के सैनिक तानाशाहों ने सत्ता पर कब्जा करने के बाद दिखाई थी।
मुस्तफा कमाल पाशा, गमाल अब्दुल नासिर और सद्दाम हुसैन के शासन में इन तीनों देशों ने धार्मिक कट्टरपंथ से काफी हद तक मुक्ति पाई थी। मगर पाकिस्तानी सैन्य तानाशाहों ने न केवल कट्टरपंथियों से जुगलबंदी बनाए रखी बल्कि जनरल जिया उल हक ने तो वहां शरिया कानून लागू कर दिया। नतीजा यह रहा कि पाकिस्तान लोकतंत्र से तो वंचित रहा ही, सामाजिक-आर्थिक सुधारों से भी अछूता बना रहा। स्वाभाविक रूप से वहां मध्यम वर्ग नहीं विकसित हो पाया, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद माना जाता है।
अच्छी बात इस सिलसिले में यह है कि धीरे-धीरे ही सही, पर 21 वीं सदी में वहां लोकतांत्रिक चेतना मजबूत होती दिखी है। इसमें न्यायपालिका की खास भूमिका रही है। मुशर्रफ के शासनकाल में वकीलों की अगुआई में चले आंदोलन ने सैन्य तानाशाही के खिलाफ माहौल बनाने में काफी मदद की और अब विशेष अदालत का ताजा फैसला इस लिहाज से अहम है कि वहां के संभावित सैनिक शासकों में यह थोड़ी हिचक पैदा कर सकता है। यह न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए सुकून की बात होगी, हालांकि एक स्थायी लोकतंत्र बनने के लिए पाकिस्तान को और भी बहुत कुछ करना होगा।
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