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शांति की दिशा में
July 12, 2019 • RAGINI SINGH

 

 

 

 


अफगानिस्तान सरकार, तालिबान और अफगान समाज के कुछ अन्य प्रतिनिधियों में अपने देश के भविष्य का एक खाका तैयार करने पर सहमति बन गई है। तालिबान हिंसात्मक गतिविधियां कम करने के लिए राजी हो गए हैं। कतर की राजधानी दोहा में हुई दो दिवसीय वार्ता के बाद मंगलवार को एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया गया जिसमें सभी पक्षों ने गृहयुद्ध समाप्त करने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत पर बल दिया। इसके साथ ही राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करने की बात भी कही।
जर्मनी और कतर के प्रयासों से हुई इस वार्ता में कुछ सरकारी अधिकारियों समेत 60 सदस्यीय अफगान प्रतिनिधिमंडल ने हिस्सा लिया था। हालांकि अफगान अधिकारी सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर इसमें शामिल नहीं हुए थे। अमेरिका ने कहा है कि सितंबर में अफगानिस्तान में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने हैं, इससे पहले वह तालिबान के साथ एक राजनीतिक समझौता करना चाहता है, ताकि विदेशी सुरक्षा बलों की वापसी शुरू हो सके। समझौते का आधार यह है कि अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से सुरक्षित और शांतिपूर्वक निकल जाएगी लेकिन बदले में विद्रोहियों को गारंटी देनी होगी कि न तो वे अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल अलकायदा जैसी बाहरी ताकतों को करने देंगे, न ही खुद दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए खतरा बनेंगे। 
शांति की दिशा में यह निश्चय ही एक अहम कदम है लेकिन आगे की राह अब भी आसान नहीं है। तालिबान वार्ता की मेज पर इसलिए आए हैं ताकि अपनी परंपरागत छवि से बाहर निकल सकें और अपने देश की मुख्यधारा की शक्ति के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त कर सकें। हालांकि यह भी सच है कि तालिबान लड़ाके 18 साल लंबी लड़ाई से थक चुके हैं और उन्हें आईएसआईएस जैसे संगठनों से चुनौती भी मिलने लगी है। तालिबान संगठन अफगान सरकार को मान्यता नहीं देता। वह उसे अमेरिका की कठपुतली सरकार बताता है और मौजूदा संविधान को स्वीकार नहीं करता। ऐसे में सवाल यह है कि वर्तमान सत्ता और तालिबान को मिलाकर अफगानिस्तान का राजनीतिक ढांचा कैसा बनेगा? उससे पहले यह कि सरकार और तालिबान में संवाद की स्थिति कैसे बनेगी? इन दोनों से बड़ा सवाल है कि क्या यह समझौता जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा? यह तभी संभव है जब अफगान जनता के सरोकार और चिंताएं इसमें शामिल हों। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने देशवासियों को भरोसा दिया है कि अमन कायम करने के नाम पर उनके अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। 
देखना है, धुर-कट्टरपंथी तालिबान अपने मुल्क में जनतंत्र, मानवाधिकार, स्त्री स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर अपने पुराने रवैये में कितना बदलाव ला पाते हैं। सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शांति प्रक्रिया अफगानिस्तान को फिर एक कठमुल्ले समाज की ओर न धकेल दे।